एक आंदोलन, तीन मुक़द्दर: विरोध की राजनीति का त्रिकोणीय सच

भारत के समकालीन छात्र आंदोलनों की स्मृति में जेएनयू के तीन नाम हमेशा लिए जाते हैं। ये तीन नाम हैं; कन्हैया कुमार, अनिर्बान भट्टाचार्य और उमर ख़ालिद। तीनों ने मिलकर सत्ता की आलोचना की, कैंपस राजनीति को राष्ट्रीय विमर्श में बदल दिया और “असहमति” की आवाज़ को लोकतंत्र के भीतर मज़बूती दी। लेकिन, आज दस साल से कम समय में तीनों की ज़िंदगियां अलग-अलग दिशाओं में हैं।

कन्हैया कुमार ने राजनीति को पेशेवर रास्ता बना लिया। पहले वाम से जुड़े और फिर कांग्रेस में शामिल होकर संसद तक पहुंचने का प्रयास किया। मीडिया और जनता के बीच उनकी पहचान एक “युवा राजनेता” के रूप में स्थापित हो चुकी है। अनिर्बान भट्टाचार्य ने राजनीति से दूरी बनाकर शिक्षण और वैचारिक जीवन को चुना और अपेक्षाकृत आरामदायक और सुरक्षित नागरिक जीवन जी रहे हैं। परंतु, उमर ख़ालिद अब भी जेल में हैं, उनके ख़िलाफ़ गंभीर आरोपों की लंबी क़ानूनी लड़ाई जारी है और सार्वजनिक जीवन से वे लगभग गुमनाम हो चुके हैं।

सामाजिक निहितार्थ

यह विभाजन हमें बताता है कि समाज विरोध के नेताओं के साथ समान व्यवहार नहीं करता। कोई यदि मुख्यधारा में फिट बैठ जाए, तो उसे जगह मिल जाती है, लेकिन जो लगातार असहज प्रश्न उठाता है, उसकी राह कठिन बना दी जाती है। उमर ख़ालिद का जेल में होना और समाज का चुप रह जाना यह दिखाता है कि बहुसंख्यक समाज असहमति की आवाज़ों को स्वीकार करने में अब भी सहज नहीं है।

सांस्कृतिक निहितार्थ

भारतीय संस्कृति में विविधता और असहमति की परंपरा रही है। लेकिन, आज असहमति को “देशद्रोह” या “ख़तरा” कहकर ख़ारिज करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। यह सांस्कृतिक परिदृश्य को कमज़ोर करता है, क्योंकि संस्कृति का विकास प्रश्न पूछने, टकराव और नए विचारों से ही होता है। कन्हैया और अनिर्बान का अपेक्षाकृत सुरक्षित जीवन और उमर का हाशिये पर चला जाना यह दर्शाता है कि सांस्कृतिक सहिष्णुता में गिरावट आई है।

राजनीतिक निहितार्थ

सबसे गहरी चोट तो राजनीति में दिखाई देती है। लोकतंत्र का स्वास्थ्य इसी पर टिका होता है कि असहमतियों को कैसे स्थान दिया जाता है। यदि कोई युवा नेता सत्तारूढ़ व्यवस्था से लड़कर भी राजनीति में जगह बना लेता है, तो उसे “स्वीकार्य” कहा जाता है। लेकिन, यदि कोई व्यक्ति सत्ता की बुनियादी नीतियों को चुनौती देता है और समझौता नहीं करता, तो उसे लंबे समय तक हाशिये पर या जेल में रखा जा सकता है। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए ख़तरे का संकेत है।

कन्हैया, अनिर्बान और उमर की तीन अलग-अलग कहानियां हमें भारतीय लोकतंत्र के निम्नलिखित तीन चेहरे दिखाती हैं:

1. समझौता और अवसरवाद,यानी व्यवस्था में स्थापित हो जाना,

2. साधारण जीवन का चुनाव,यानी सुरक्षित किनारे की मौज,

3. सिस्टम की कठोर सज़ा,यानी हाशिये,या विस्मृति का शिकार।

ये तीनों अलग-अलग कहानियां सवाल छोड़ती हैं कि क्या भारतीय समाज और राजनीति असहमति की आवाज़ों के साथ न्याय कर पा रही है, या फिर हम अपने लोकतंत्र को धीरे-धीरे उन चेहरों से खाली कर रहे हैं, जो हमें असुविधाजनक सच दिखाने पर आमादा हैं ?

कन्हैया, अनिर्बान और उमर,इन तीनों ने मिलकर एक ही दौर में राजनीतिक प्रश्न उठाए थे। परंतु आज उनकी अलग-अलग कहानियां दिखाती हैं कि भारतीय लोकतंत्र में असहमति की क़ीमत सबके लिए अलग-अलग है। यह केवल तीन व्यक्तियों का सवाल नहीं है, बल्कि उस पूरे समाज का दर्पण है, जो अपने भीतर आलोचना को कितना सहन कर सकता है। लोकतंत्र तभी मज़बूत होगा, जब हर आवाज़ को समान अवसर और न्याय मिले, चाहे वह सत्ता के अनुकूल हो या विपक्ष में खड़ी हो।

(उपेंद्र चौधरी वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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